नौ नवंबर की तारीख इतिहास में उत्तराखंड के स्थापना दिवस के तौर पर दर्ज हैं. उत्तराखंड में आज 21वां राज्य स्थापना दिवस बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा है. इस मौके पर देहरादून पुलिस लाइन में रैतिक परेड का आयोजन किया गया. इस अवसर पर राज्य की राज्यपाल बेबी रानी मौर्य ने कार्यक्रम में मुख्य अथिति के रूप में हिस्सा लिया. उन्होंने रैतिक परेड की सलामी ली.

नौ नवंबर, 2000 को पर्वतीय प्रदेश के रूप में उत्तराखंड ने अलग सफर शुरू किया. उम्मीदों से भरा सफर. उम्मीद से भरा इसलिए कहा गया है क्योंकि राज्य ने लंबे संघर्ष, कई उतार चढ़ाव और कई शहादतों के बाद अलग राज्य का मुकाम हासिल किया था. जाहिर है खुशी मनाना बनता ही था.

यह सफर जारी है लेकिन अब स्थिति बदली है. अब प्रदेश के लोग उम्मीदों को पंख मिलते देखना चाहते हैं. बीस साल के उत्तराखंड के सामने अब चुनौती और भी बढ़ गई है. प्रदेश में अभी भी लोग सड़क, पानी और बिजली के लिए परेशान हैं. ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवा का बुरा हाल है. राज्य के लिए लड़ाई लड़ने वाले आंदोलनकारी जस का तस जीवन यापन करने को मजबूर हैं.

इनको कब मिलेगा इन्साफ ?

उत्तराखंड के आंदोलनकारियों के दमन और मां-बहनों की अस्मत रौंदने वाले पुलिस-प्रशासन के बड़े से लेकर छोटे कारिंदों का अब तक कुछ नहीं बिगड़ा. कई आरोपी और बड़े रसूखदार होकर रिटायर हो गए. कुछ अहम गवाहों की हत्या हो गई. वर्षों से जो कुछ बचे-कुचे मामले मुजफ्फरनगर की अदालतों में चल रहे हैं, इनकी पैरवी पर यहां की सरकारों की ओर से प्रयास नहीं करने से अब आंदोलनकारियों के गुनहगारों को सजा मिलेगी, इस पर संदेह है.

आंदोलनकारियों का सरकार ने नहीं दिया साथ

उत्तराखंड राज्य गठन को 20 साल पूरे हो गए हैं. राज्य गठन को लेकर सड़क से लेकर सदन तक कूच करने वाले राज्य आंदोलनकारियों की बदतर हालत पर सरकार गंभीर नहीं है. कालाढूंगी के चकलुवा में बिस्तर पर अपाहिज हालत में पड़े राज्य आंदोलनकारी नंदन सिंह कुमटिया (46) पुत्र भूपाल सिंह कुमटिया इसका उदाहरण हैं.

इन्साफ की राह देखते आंदोलनकारी नंदन सिंह कुमटिया

पहले तो सरकार ने 16 साल बाद नंदन सिंह कुमटिया को राज्य आंदोलनकारी माना, उसके बाद नंदन को राज्य आंदोलनकारी की पेंशन जारी हुई. इस बीच एक सड़क हादसे में नंदन के पूरे शरीर में पैरालिसिस हो गया, जिसके बाद से उनकी जिंदगी बदल गई. नंदन की शिकायत है कि अपना इलाज कराने में उनकी कई बीघा जमीन बिक गई लेकिन किसी भी सरकार ने उनकी कोई मदद नहीं की. हर महीने इलाज में 5 से 6 हजार रुपये का खर्च आ रहा है.