यूपी में राज्यसभा चुनाव को लेकर चले शह-मात के खेल में सपा ने बसपा के बागियों ने को शह क्या दी, बिफरीं मायावती ने खुद के लिए मुश्किलों भरी राह अपना ली है.

विधान परिषद चुनाव में सपा को सबक सिखाने की सौगंध के साथ बीजेपी के प्रति जो नरम रुख बसपा मुखिया ने दिखाया है. उसके हानिकारक परिणाम आंके जा रहे हैं और अब तक उनके साथ खड़ा मुस्लिम मतों का एक वर्ग उनसे दूर होता नजर आ रहा है.

बीजेपी से असंतुष्ट नेता अपने लिए बसपा में संभावनाएं देख रहे थे, वो भी अब दूरी बना रहे हैं. इस स्थिति में मायावती के लिए अपना कुनबा बढ़ाना तो दूर, सिमटते जा रहे साम्राज्य को संभालने की भी चुनौती होगी.

अब तक तो विरोधी ही मायावती पर बीजेपी से मिले होने का आरोप लगाते रहे हैं, लेकिन बसपा सुप्रीमो ने खुद ही सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर तीखे प्रहार करते हुए उन्हें सबक सिखाने के लिए बीजेपी का साथ देने तक का एलान कर दिया.

मायावती के इस ऐलान के बाद सियासी माहौल एकदम से गरमा गया है. हालात बता रहे हैं कि इंतकाम की ये कहानी अगले डेढ़ बरस यानी विधानसभा चुनाव तक चलती रहेगी. फिलहाल तो नुकसान नीले खेमे में ही नजर आ रहा है.

मायावती मुस्लिम समाज के निशाने पर

यूपी की राजनीति में मुस्लिम उसके साथ जाता रहा है, जो बीजेपी को हराने की स्थिति में हो. मुस्लिम मतों को लुभाने के लिए खुद को उनका सच्चा हितैषी बताते हुए मायावती भी पूर्व में न केवल उन्हें ज्यादा टिकट देती रहीं, बल्कि बीजेपी से साठ-गांठ के आरोपों को भी सिरे से खारिज करती रहीं. लेकिन, अब वे सीधे तौर पर मुस्लिम समाज के निशाने पर होंगी.

बसपा से बगावत करने वाले विधायक असलम अली कहते हैं कि, “हम लोग तो बीजेपी के खिलाफ ही लड़कर आए हैं, लेकिन अब पार्टी ही बीजेपी के साथ जा रही है.”

सपा के लिए राहें आसान

सत्ताधारी बीजेपी से असंतुष्ट नेताओं का रुख भी अब बसपा के बजाए सपा और अन्य पार्टियों की तरफ होगा. चूंकि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को अभी सूबे में पैर जमाने के लिए खुद ही बहुत मेहनत करनी है, इसलिए असंतुष्टों की पहली पसंद सपा ही बनती दिख रही है. जिन सीटों पर भाजपा के विधायक हैं और वहां पिछले चुनाव में बसपा दूसरे स्थान पर रही है, वहां से चुनाव लड़ने वाले खास तौर से सपा का दामन थामने को तैयार दिख रहे हैं.

बसपा की पकड़ दलति सीटों पर हो रही कमजोर

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता का भी मानना है कि अगला विधानसभा चुनाव तो हमें सपा के खिलाफ ही लड़ना है. बसपा तो कहीं की नहीं रहेगी. कभी मायावती के करीबी रहे बसपा के बागियों का दावा है कि बसपाई कुनबे के कई और विधायक व नेता भी पार्टी को छोड़ने को तैयार हैं.

बस, विधानसभा चुनाव और थोड़ा नजदीक आ जाएं. गिनती के केवल वही विधायक बसपा के साथ रहेंगे, जिनके विधानसभा क्षेत्र में दलित वोटर्स का बड़ा फैक्टर है. हालांकि, दलित वोटों में बीजेपी अपनी नीतियों से सेंधमारी करती जा रही है और भीम आर्मी भी दलित युवाओं को आकर्षित कर रही है, जिससे दलित बहुल सीटों पर भी बसपा की पकड़ लगातार कमजोर होती दिख रही है.