असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है रावण वध , लेकिन यही रावण किसी रोजगार की डोर बन बैठे. बुराई का प्रतीक बना रावण, कारीगरों के लिए एक रोजगार का सहारा बन उठा. रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों की रचना से कारीगर अपना पेट भरते थे. सुतली, कागज व बांस-बल्ली से रावण और उसके भाइयों का पुतले का निर्माण करने का सिलसिला उत्तर-पूर्वी दिल्ली के नंदनगरी स्थित जनता फ्लैट पार्क में चल रहा है.

आर्थिक स्थिति काफी हद तक ठीक रहती

कारीगरों के दल में प्रत्येक की भूमिका अलग अलग होती है. एक रावण का चेहरा तैयार करता है, तो कोई को पुतले के दूसरे अंगों के तैयार करते है. पुतला बनाने का सिलसिला एक महीने से चल रहा है. कलाकार पड़ोसी राज्यों से आकर यहां काम करता है. इनमें से कुछ तो पुश्तैनी तौर पर इस काम से जुड़े हैं. दशहरा बीतने के बाद तो यह कारीगर अपना पेट पालने के लिए मजदूरी करते हैं. कारीगरों ने बताया की दशहरा में पुतले बनाने से उनकी आर्थिक स्थिति काफी हद तक ठीक रहती है व कुछ रकम जमा भी हो जाती है.

पुतले बनाने के मिले 30 हजार रुपये

कलाकारों के अनुसार काम शुरू करने के दौरान बतौर पेशगी 30 हजार रुपये तक मिल जाते हैं और तकरीबन आधा काम होने के बाद 40 हजार रुपये तक का भुगतान मिल जाता है. साथ ही पुतलों में पटाके व आग लगाने के लिए भी कलाकारों को 20-30 हजार रुपये मिल जाते है.