उत्तराखंड जल निगम में हुई असिस्टेंट इंजीनियर और जूनियर इंजीनियर की भर्ती में 15 साल बाद नया मोड़ आ गया है. एक आरटीआई में मिली जानकारी के अनुसार भर्ती में नियम-कानूनों को ताक पर रखकर आरक्षित कोटे के पदों पर दूसरे प्रदेशों के जाति प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी दे दी गई.

जल निगम में साल 2005 में असिस्टेंट इंजीनियर और जूनियर इंजीनियरों के पदों पर भर्ती हुई थी. पंजाब यूनिवर्सिटी को भर्ती का जिम्मा दिया गया था. यूनिवर्सिटी ने परीक्षा कराने के बाद मेरिट लिस्ट बना कर जल निगम मुख्यालय ने नियुक्ति दे दी.
जल निगम ने प्रमाण पत्रों की शायद जांच नहीं की.

नियुक्ति में कई ऐसे लोगों को नौकरी दी गई जिनके जाति प्रमाण पत्र प्रदेश के बाहर के उत्तराखंड के न होकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों से बने हुए थे. यह जानकरी 15 साल बाद तब हुई जब आरटीआई डाली गयी.

अपर सचिव पेयजल ने मामले में जांच के आदेश देते हुए जल निगम के प्रबंध निदेशक वीसी पुरोहित से रिकार्ड तलब किया. उन्होंने इस मामले में न्याय और कार्मिक विभाग से भी राय मांगी है. सूत्रों के अनुसार, जल निगम में कोटे के करीब 30 पदों पर गलत सर्टिफिकेट के आधार पर नियुक्तियां हुई हैं.

नियुक्ति प्रक्रिया में एससी कोटे में ही नहीं बल्कि महिला कोटे में भी जमकर गड़बड़ी हुई. महिला कोटे के तहत दूसरे राज्य की महिलाओं को उत्तराखंड प्रदेश में नियुक्ति दे दी गई. जबकि कार्मिक विभाग की कर्मचारी चयन सेवा नियमावली में स्पष्ट प्रावधान है कि आरक्षित पदों पर सिर्फ राज्य के आरक्षित वर्ग के लोगों को ही लाभ मिलेगा. इसके लिए जाति प्रमाण पत्र भी राज्य का ही बना होना चाहिए. यही नियम महिला कोटे के पदों को लेकर भी है.

नियुक्ति करने वालों पर कैसे होगी कार्रवाई! अधिकतर हो चुके रिटायर

ये भर्तियां वर्ष 2005 में कांग्रेस शासनकाल में हुई थीं. उस समय नियुक्ति कमेटी में शामिल अधिकतर लोग अब रिटायर हो चुके हैं. कमेटी में तत्कालीन मुख्य अभियंता मुख्यालय समेत कई मुख्य अभियंता भी सदस्य रहे.

उक्रांद निगम प्रबंधन ने इस फर्ज़ीवाड़े के खिलाफ पहले ही मोर्चा खोल चुका है.
शासन स्तर पर कार्मिक विभाग ने बीच बीच में ऐसे कई आदेश किए, जिनसे राज्य के बेरोजगारों को बड़ा नुकसान पहुंचा.

कई विभागों, संवर्गों में अराजपत्रित श्रेणी के पदों को राजपत्रित श्रेणी में बदला गया. इससे इन पदों पर राज्य से बाहर के लोगों को भी आवेदन का मौका मिल गया. खाद्य विभाग, वन विभाग, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा विभाग में ऐसे कई आदेश हुए.

अधिकारियों का ये कहना है –

पेयजल विभाग के अपर सचिव जीबी ओली ने कहा कि इस पूरे प्रकरण को गंभीरता से लिया गया है. पेयजल निगम से भर्तियों का रिकॉर्ड मांगा गया है. इसके साथ ही न्याय और कार्मिक विभाग से भी रिपोर्ट ली जा रही है. सभी पहलुओं की जांच के बाद कोई ठोस निर्णय लिया जायेगा.
दूसरी तरफ जल निगम के प्रबंध निदेशक ने कहा कि शासन ने 2005 में हुई एई-जेई भर्ती को लेकर रिकॉर्ड मांगा था जो उपलब्ध करा दिया गया है. इसमें नियुक्तियों की भी पूरी जानकारी दे दी गई है. शासन स्तर से जैसे भी दिशानिर्देश प्राप्त होंगे, उसी के अनुरूप आगे की कार्रवाई की जाएगी.

कुछ समय से प्रदेश में हुई तमाम भर्तियों में विवाद खड़े हो चुके हैं. ग्राम पंचायत विकास अधिकारी की भर्ती में फर्जीवाड़े पर भी जमकर विवाद हुआ. फॉरेस्ट गार्ड भर्ती भी विवादों में रही. यूपीसीएल में तो विवाद के बाद जेई भर्ती निरस्त ही करनी पड़ी.

नोएडा में पहले ही हो चुका है ऐसा घपला

कुछ साल पहले नोएडा विकास प्राधिकरण में भी ऐसा ही एक मामला सामने आया था. यहां पर हरियाणा व दिल्ली के कई लोगों को कोटे के पदों पर नियुक्ति दे दी गई थी. बाद में मामला संज्ञान में आया तो जांच शुरू हुई. दूसरे राज्यों के जाति प्रमाणपत्र पर नियुक्ति पाए हुए लोगों की सेवाओं को 10 से 15 साल नौकरी करने के बाद समाप्त किया गया.