नदी को साफ सुथरा रखने के देश भर में कई अभियान चलाये जा रहे हैं. देवभूमि में पहाड़ के लोगों को जीवन प्रदान करने वाली नदियों की सुध न तो राज्य सरकार को है और न ही स्थानीय प्रशासन को है. प्रशासन सीवरेज बनाने के बजाय अब स्थानीय लोगों को नोटिस भेज रहा है.

गंदगी और कूड़े के अंबार से पटी बड़ी नदियों का आकार धीरे-धीरे बदल रहा है. नगरों के बीच से बहने वाले अधिकतर सीवर का पानी नदियों में छोड़ दिया जाता है. सीवर के पानी से प्रदूषण का यह आलम यह है कि मैली हो चुकी नदियों में लोग स्नान करने में भी कतराने लगे हैं.

देवभूमि में एक नदी का नाम है लोहावती. दो अलग-अलग धाराएं इस नदी का निर्माण करती हैं. लोहावती का उद्गम पाटन के शंख पाल नामक स्थान से होता है. लोहाघाट तक पहुंचते-पहुंचते इस नदी की धारा में कई नाले भी मिल जाते हैं. अन्य नाले मिल जाते हैं.

नदी लोहाघाट में पहुंचती है तो नदी मी मिलता है पूरे लोहाघाट का गंदा पानी. इसका कारण है लोहाघाट में सीवरेज की व्यवस्था न होना. नदी का पानी पूरी तरह दूषित हो चुका है.

इन सबके के बाद लोहाघाट नगर के ऋषेश्वर श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार के बाद छोड़े अवशेष भी नदी में डाल दिए जा रहे हैं. ये अवशेष खाज में कोढ़ का काम कर रही हैं. दो माह पूर्व नदी में सीवरेज का पानी बहा रहे 76 लोगों को प्रशासन के सहयोग से नोटिस दिया गया था. इन लोगों ने अब नदी में सीवर बहाना बंद कर दिया है. दूसरी तरफ मीना बाजार से आने वाले नाले का गंदा पानी अभी भी लोहावती में गिर रहा है. अब प्रशासन यहां के आस-पास सर्वे कर नदी में सीवरेज का पानी बहाने वालों को चिन्हित कर नोटिस भेजने की तैयारी कर रही है.

ताक़ पर रख दिए गया है हाईकोर्ट का आदेश

लोहावती नदी से लोहाघाट नगर के लिए चौड़ी लिफ्ट पेयजल योजना बनी है. नदी में सीवर के पानी के साथ अन्य गंदगी छोड़े जाने से लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं.

नदियों के किनारे 200 मीटर के दायरे में नया निर्माण न करने के हाईकोर्ट के आदेशों के बाद भी कई लोग पेट्रोल पंप के आस-पास नदी किनारे आवासीय मकान बना रहे हैं. प्रशासन ने ऐसे नौ लोगों को नोटिस तो दिया है लेकिन उनका निर्माण कार्य नहीं रोका जा रहा है.